ब्रिक्स पे: डॉलर के तिलिस्म को चुनौती

डॉ पूर्णिमा कुमारी
दशकों से वैश्विक वित्त व्यवस्था का पर्याय बना डॉलर अब पहली बार ऐसी डिजिटल चुनौती के सामने है, जो उसकी जड़ों तक पहुंच सकती है। ‘ब्रिक्स पे’ सिर्फ भुगतान प्रणाली नहीं, बल्कि बदलती विश्व-व्यवस्था में वित्तीय संप्रभुता और बहुध्रुवीयता की दस्तक है।

बीते 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली के भव्य ‘भारत मंडपम’ में जब 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का समापन हुआ, तो वह केवल कुछ देशों का मिलन मात्र नहीं था, बल्कि वह वैश्विक वित्तीय एकध्रुवीयता के अंत की एक दबी हुई आहट थी। ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि दुनिया ने एक नए शब्द की गूंज सुनी—’ब्रिक्स पे’। यह डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) का वह हथियार है, जो दशकों से अभेद्य माने जा रहे अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व में एक गहरा ‘डेंट’ मारने को तैयार है। डॉलर की कहानी अब केवल अमेरिका की शक्ति की कहानी नहीं रही, बल्कि यह हमारी जेबों की संप्रभुता और ग्लोबल साउथ के आत्मसम्मान का नया कुरुक्षेत्र बन गई है।
दशकों से अमेरिकी डॉलर वैश्विक अर्थव्यवस्था का केवल एक सिक्का नहीं, बल्कि एक ‘कॉमन लैंग्वेज’ बना हुआ है। जैसे किसी तिलिस्म ने पूरी दुनिया को जकड़ लिया हो, डॉलर के इस मायाजाल ने देशों को एक ऐसे वित्तीय नेटवर्क में बांध रखा है, जहां हर व्यापार, हर ऋण और हर विदेशी मुद्रा भंडार को ‘ग्रीनबैक’ के आगे सिर झुकाना पड़ता है। लेकिन दिल्ली के गलियारों में इस बार हवा का रुख कुछ अलग था। ‘ब्रिक्स पे’ की सक्रिय शुरुआत ने यह संकेत दे दिया है कि दुनिया अब एक-ध्रुवीय फाइनेंशियल सिस्टम की उबाऊ सुस्ती से निकलकर एक अधिक ‘डायवर्सिफाइड’ व्यवस्था की ओर बढ़ने को आतुर है।
डॉलर का एकछत्र राज: किंग प्लेयर या सुनहरा पिंजरा?
‘ब्रिक्स पे’ की चुनौती को समझने के लिए पहले डॉलर की उस ‘माया’ को समझना होगा जिसने वैश्विक बाजारों को वशीभूत कर रखा है। डॉलर केवल पैसा नहीं है, यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार का ऑक्सीजन है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के 2026 की पहली तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि ग्लोबल फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व में आज भी डॉलर की भागीदारी 57.13% है। डॉलर की गहरी तरलता ने दुनिया के केंद्रीय बैंकों को मजबूर कर रखा है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए डॉलर का ही संचय करें।
लेकिन 2008 के वित्तीय संकट ने विकसित और विकासशील देशों को एक कड़वा पाठ पढ़ाया था। इसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वित्तीय नियंत्रण का एकाधिकार केवल अमेरिका और यूरोपीय संघ के पास होना सुरक्षित नहीं है। डॉलर, जिसे हमने अपनी सुविधा के लिए चुना था, वह कभी-कभी ‘वित्तीय भस्मासुर’ बन जाता है, जहां एक देश की राजनीति पूरी दुनिया की रसोई का बजट बिगाड़ देती है।
ब्रिक्स का सफर: एक परिकल्पना से वैश्विक शक्ति तक
ब्रिक्स का इतिहास आर्थिक थ्योरी के यथार्थ में बदलने की एक अद्भुत गाथा है। जब 2001 में गोल्डमैन सैक्स के जिम ओ नील ने ‘ब्रिक’ शब्द गढ़ा था, तब यह केवल एक भविष्यवाणी थी। लेकिन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में हुई पहली आधिकारिक बैठक से लेकर आज 11 देशों के समूह तक, ब्रिक्स ने वह कर दिखाया जो असंभव माना जाता था। आज यह समूह विश्व की 49.5% आबादी और ग्लोबल जीडीपी (पीपीपी) के 40% हिस्से को अपनी बाहों में समेटे हुए है।
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में भारत ने खुद को एक ‘सशक्त वैश्विक विचारक’ के रूप में स्थापित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में पारित सर्वसम्मत घोषणापत्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब ग्लोबल साउथ की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। भारत ने क्रूड ऑयल की सप्लाई चेन को डॉलर के चंगुल से निकालने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर जो जोर दिया, वह डॉलर के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है।
ब्रिक्स पे: बिचौलिया मुद्रा का अंत
‘ब्रिक्स पे’ केवल एक पेमेंट ऐप नहीं है, बल्कि यह डॉलर की मध्यस्थ भूमिका को खत्म करने की एक डिजिटल कैंची है। वर्षों से नियम यह रहा है कि यदि भारत रूस से तेल खरीदे या ब्राजील चीन को सोयाबीन बेचे, तो लेनदेन अक्सर पहले डॉलर में बदलना पड़ता था। इससे न केवल पश्चिमी बैंकों की जेब भरती थी, बल्कि व्यापार की गोपनीयता भी वाशिंगटन के रडार पर रहती थी।
ब्रिक्स पे एक ऐसा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है जो इस ‘डॉलर ट्रैप’ को बाईपास करता है। यह सदस्य देशों को उनकी अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में सीधे भुगतान की सुविधा देता है। जब अरबों डॉलर का व्यापार सीधे रुपयों, युआन या रियाल में होने लगेगा, तो डॉलर की मांग में स्वाभाविक ह्रास होगा। भारत ने पहले ही रूस के साथ रुपये में और यूएई के साथ स्थानीय मुद्रा सेटलमेंट को प्राथमिकता देकर इस ‘डी-डॉलराइजेशन’ की नींव रख दी है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक: वित्तीय संप्रभुता का नया किला
ब्रिक्स का अपना बैंक – न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी)—अब पारंपरिक वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के विकल्प के रूप में उभर रहा है। जहां वर्ल्ड बैंक की मदद अक्सर पश्चिमी शर्तों के साथ आती है, वहीं एनडीबी ग्लोबल साउथ के इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए एक संप्रभु रास्ता दिखाता है। लोकल करेंसी में ऋण देकर यह बैंक विकासशील देशों को अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव के झटकों से बचाता है।
अभ्यास का प्रभाव: पत्थर पर निशान
आलोचक अक्सर पूछते हैं कि क्या एक डिजिटल सिस्टम डॉलर के साम्राज्य को ढहा पाएगा? इसका उत्तर कूटनीति के उस पुराने दोहे में छिपा है जिसे भारत ने सदियों से जिया है:
“करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,/ रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान।”
ब्रिक्स पे वह ‘कोमल रस्सी’ है, जो डॉलर जैसे ‘कठोर पत्थर’ पर बार-बार रगड़ खाकर अपना निशान छोड़ने की शुरुआत कर चुकी है। डॉलर अभी भी ‘किंग प्लेयर’ हो सकता है, लेकिन ब्रिक्स कह रहा है कि अब वैकल्पिक प्लेटफार्मों पर भी काम करने का समय आ गया है। वैश्विक मुद्रा व्यवस्था में अगली बड़ी कहानी की शुरुआत इसी ‘डेंट’ से होगी।
दिल्ली की दहलीज से नई नियति तक
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए एक ‘टर्निंग पॉइंट’ रहा। भारत ने न केवल खुद को ग्लोबल साउथ के मसीहा के रूप में पेश किया, बल्कि डॉलर के एकछत्र राज को चुनौती देने के लिए एक ठोस तकनीकी रोडमैप भी दिया।
सत्य यह है कि डॉलर का साम्राज्य एक दिन में नहीं गिरेगा, लेकिन दिल्ली की दहलीज पर जो ‘ब्रिक्स पे’ की मशाल जलाई गई है, उसकी तपिश वाशिंगटन में महसूस की जाने लगी है। जब इतिहास इस कालखंड को देखेगा, तो वह पाएगा कि डॉलर के मायाजाल को तोड़ने की प्रक्रिया किसी युद्ध से नहीं, बल्कि एक डिजिटल कोड से शुरू हुई थी। 21वीं सदी की अगली बड़ी आर्थिक कहानी अब लिखी जा चुकी है—और उसका शीर्षक है ‘बहुध्रुवीय वित्तीय संप्रभुता’। डॉलर के राज में डेंट लग चुका है, और अब यह निशान केवल गहरा ही होगा।
लेखिका आर्थिक मामलों की विशेषज्ञ हैं। इस आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन संस्था के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों।


