नेपाल के बाद क्या हिमालय पर मंडरा रहा है ‘अल्टीमेट डिजास्टर’?

सीन कुछ यूं है: नेपाल में हुई भयानक तबाही ने सिर्फ वहां के आम लोगों को नहीं हिलाया है, बल्कि दिल्ली में बैठे एक्सपर्ट्स की भी नींद उड़ा दी है। वजह यह है कि हमारा अपना हिमालयन रीजन आज की तारीख में एक टिकिंग टाइम बम बन चुका है। सिचुएशन इतनी सीरियस है कि जियोलॉजिस्ट्स अब यह वार्निंग दे रहे हैं कि उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में कभी भी ‘नेपाल वाला चैप्टर’ रिपीट हो सकता है। पहाड़ों को काट-काटकर जिस तरह से हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और टनल बनाने का खेल चल रहा है, उसने इस पूरे नेचुरल सिस्टम की धज्जियां उड़ा दी हैं।
अरुणाचल वाला ‘गेम ओवर’ रिस्क
असली कहानी शुरू होती है अरुणाचल के पास से, जहां चीन ने तिब्बत वाले इलाके में एक मेगा-डैम प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसका बजट करीब डेढ़ सौ अरब अमेरिकी डॉलर है और टारगेट 2033 तक इसे कंप्लीट करने का है। एक्सपर्ट्स इसे सीधे शब्दों में ‘वाटर बम’ बोल रहे हैं और इसके पीछे की वजह इसका आकार नहीं, बल्कि इसकी लोकेशन है। यह मेडॉग प्रोजेक्ट एक्जेक्टली उस फॉल्ट जोन के पास है जहां इंडियन और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स आपस में टकराती हैं। मतलब, अर्थक्वेक के मामले में यह इलाका रेड जोन में है। पिछले साल ही तिब्बत के शिगात्से में 7.1 की तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें 120 से ज्यादा लोग मारे गए थे और कई बांधों को नुकसान पहुंचा था।
चाइना भले ही यह क्लेम करे कि उनका डैम अर्थक्वेक-प्रूफ है, लेकिन भूवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कोई बड़ा झटका लगा, तो चट्टानें दरक सकती हैं। डैम भले बच जाए, लेकिन नीचे की तरफ यानी भारत वाले हिस्से में पानी का ऐसा तांडव मचेगा कि नेपाल जैसी आपदा छोटी लगने लगेगी। याद है साल 2000 का तिब्बत डैम बर्स्ट या 2017 में सियांग नदी का पानी अचानक काला पड़ जाना? संकेत पहले भी मिल चुके हैं, पर हम उन्हें इग्नोर करते आए हैं।
काउंटर-अटैक: इंडिया का मास्टरप्लान या नया बखेड़ा?
चाइना की इस चाल से निपटने के लिए भारत सरकार ने भी अपर सियांग में 11,000 मेगावाट का एक तगड़ा मल्टीपरपज प्रोजेक्ट लाने का प्लान किया है। लेकिन लोकल लेवल पर इसका तगड़ा विरोध हो रहा है। आम जनता का कहना है कि इस एक प्रोजेक्ट से डेढ़ लाख से ज्यादा लोग बेघर और विस्थापित हो जाएंगे। अरुणाचल सरकार ने वैसे भी 2025-35 को ‘पनबिजली का दशक’ घोषित कर रखा है, जहां दिबांग, अपर सियांग और लोअर सुबनसिरी जैसे कई प्रोजेक्ट्स पाइपलाइन में हैं। लेकिन जब इटालीन जैसे प्रोजेक्ट्स की बात आती है, तो खतरा और बढ़ जाता है क्योंकि वह सुपर-सेंसिटिव जोन में हैं।
खतरे की घंटी: 195 ‘ग्लेशियल लेख’ और GLOF का डर
नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी यानी NDMA का एक डरावना डेटा सामने आया है। पूरे देश में ऐसी 195 ग्लेशियल झीलें पहचानी गई हैं जिनके फटने का खतरा सिर पर मंडरा रहा है और इनमें से अकेली 32 झीलें अकेले अरुणाचल प्रदेश में ही हैं। जब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पिघलते ग्लेशियर का पानी इन नेचुरल डैम्स को तोड़कर नीचे आता है, तो उसे GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहते हैं। और भाई, जब यह आता है तो रास्ते में जो भी आता है, सब साफ हो जाता है।
इस पूरे मसले पर पूर्वोत्तर के मशहूर भूवैज्ञानिक डॉ. प्रमोद चंद्र सरमा साफ कहते हैं कि हिमालय अभी ‘यंग’ और नाजुक है, जहां अर्थक्वेक, लैंडस्लाइड और फ्लड नेचुरल हैं, लेकिन क्लाइमेट चेंज और इन अंधाधुंध मेगा-डैम्स ने इस रिस्क को कई गुना बढ़ा दिया है। वहीं, सियांग इंडीजीनस फार्म्स फोरम के प्रमुख जेजांग का मानना है कि चाइना बॉर्डर के पास बन रहे ये प्रोजेक्ट्स हमारे लिए इनवाइटेड डिजास्टर हैं और नेपाल जैसा हाल यहां होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
क्या है इसका सल्यूशन?
बचाव के नाम पर मिनिस्ट्री ऑफ पावर का कहना है कि सरकार अर्ली-वार्निंग सिस्टम पर काम कर रही है। देश के 46 बेहद संवेदनशील बांधों में से 40 में यह सिस्टम लगाया जा चुका है और चरणबद्ध तरीके से बाकी जगहों पर भी इसे लाया जा रहा है। यूनाइटेड नेशंस ने पहले ही चेताया है कि भारत और चीन के बीच क्लाइमेट चेंज की मार से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ऐसे में, जियोलॉजिकली अनस्टेबल हिमालयी क्षेत्र में सियांग जैसे मेगा-डैम्स का स्ट्रगल कितना सही है और कितना गलत—यह वो सवाल है जिस पर अब सच में सीरियस सोचने का वक्त आ गया है।

